शंभु नाथ महाराज(मृत्यु)

शम्भू महाराज🎂16 नवम्बर1910(पक्का नही)⚰️04 नवंबर 1970
शंभू महाराज
जन्म16 नवम्बर1910
लखनऊ , संयुक्त प्रांत आगरा और अवध , ब्रिटिश भारत
मृत 4 नवंबर 1970 (आयु 59-60)
नई दिल्ली , भारत
राष्ट्रीयता उतार प्रदेश।
बेटे कृष्णमोहन , राममोहन
 बेटी रामेश्वरी
भतीजे हर्ष मोहन मिश्रा पंडित राम मोहन महाराज के पुत्र और लेफ्टिनेंट पंडित बिरजू महाराज के भतीजे हैं, जो बॉलीवुड उद्योग में एक प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और दृश्य प्रभाव पर्यवेक्षक हैं।
पेशा भारतीय शास्त्रीय संगीत नर्तक
सक्रिय वर्ष 1952–1970
के लिए जाना जाता है पद्मश्री , संगीत नाटक अकादमी फ़ेलोशिप
रिश्तेदार लच्छू महाराज (भाई)
महान शास्त्रीय गायक कत्थक नृत्य गुरु शम्भू महाराज की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
शम्भू महाराज जन्म- 16 नवम्बर, 1907 लखनऊ, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 4 नवम्बर, 1970) भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली कत्थक के प्रसिद्धि प्राप्त गुरु तथा नर्तक थे। वे लखनऊ घराने से सम्बंधित थे। उनका वास्तविक नाम 'शंभूनाथ मिश्रा' था। नृत्य के संग ठुमरी गाकर उसके भावों को विभिन्न प्रकार से इस अदा से शंभू महाराज प्रदर्शित करते थे कि दर्शक मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता था
शंभू महाराज का जन्म 16 नवम्बर सन 1907 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। लखनऊ घराने के प्रसिद्ध नर्तकों में उनका विशिष्ट स्थान रहा है। नृत्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 'नृत्य सम्राट' की उपाधि से विभूषित किया गया था। शंभू महाराज के पिता कालका प्रसाद तथा पितामह दुर्गा प्रसाद के साथ अग्रज अच्छन महाराज भी अपने समय के श्रेष्ठ नृत्यकारों में से एक थे। इस प्रकार नृत्य कला उन्हें विरासत में मिली थी।

शंभू महाराज को कत्थक नृत्य की शिक्षा सबसे पहले उनके चाचा बिन्दादीन महाराज से और बाद में बड़े भाई अच्छन महाराज से मिली। नृत्य के अतिरिक्त उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का भी अध्ययन किया। विशेष रूप से ठुमरी का। ठुमरी गायिकी की शिक्षा उन्होंने मुईनुद्दीन खाँ के अनुज रहीमुद्दीन खाँ से प्राप्त की। इस प्रकार शंभू महाराज नृत्य व संगीत के गायन दोनों विधाओं में पारंगत थे।

शंभू महाराज नृत्य को लय से अधिक भाव-प्रधान के महत्त्व को स्वीकार करते थे। उनकी मान्यता थी कि- "भाव-विहीन लय-ताल प्रधान नृत्य मात्र एक चमत्कारपूर्ण तमाशा हो सकता है, नृत्य नहीं हो सकता।" नृत्य कौशल के प्रदर्शन में शंभू महाराज शोक, आशा, निराशा, क्रोध, प्रेम, घृणा आदि भावों को चमत्कारपूर्ण दिखाते थे। बहुत-से प्राचीन बोल, परण तथा टुकड़े उन्हें कंठस्य थे। नृत्य के संग ठुमरी गाकर उसके भावों को विभिन्न प्रकार से इस अदा से शंभू महाराज प्रदर्शित करते थे कि दर्शक मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता था। गायन में ठुमरी के साथ दादरा, गज़ल व भजन भी बड़ी तन्मयता से श्रोताओं को सुनाते थे।

शंभू महाराज को 1967 में 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप' से तथा 1956 में 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया था।

उनके दो बेटे कृष्णमोहन और राममोहन और एक बेटी रामेश्वरी थी। उनके शिष्यों में, कथक के सबसे प्रसिद्ध प्रतिपादक उनके भतीजे बिरजू महाराज , कुमुदिनी लाखिया , दमयंती जोशी , माया राव , भारती गुप्ता, उमा शर्मा , विभा दाधीच और रीना सिंघा हैं।  उनके बेटे राममोहन भी उनके शिष्य थे और उनकी शैली का प्रदर्शन जारी रखते हैं। शंभू का गले के कैंसर का इलाज नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में तीन महीने तक चला, उसके बाद 4 नवंबर 1970 को उनकी मृत्यु हो गई। 
हर्ष मोहन मिश्रा पंडित राम मोहन महाराज के पुत्र और लेफ्टिनेंट पंडित बिरजू महाराज के भतीजे हैं, जो बॉलीवुड उद्योग में एक प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और दृश्य प्रभाव पर्यवेक्षक हैं।

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