रेशमा(मृत्यु)
मशहूर लोकगायिका रेशमा
रेशमां
जन्म
c.1947
लोहा, चूरू, राजस्थान
मूलस्थान
लाहौर, पाकिस्तान
⚰️निधन3 नवम्बर 2013
लाहौर, पाकिस्तान
विधायें पंजाबी लोकगीत
सक्रियता वर्ष
1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से 2013 तक
रेशमा अनपढ़ थी
रेशमा ठेठ पंजाबी बोलतीं थीं।
रेशमा ने सुश्री इन्दिरा गान्धी के सामने भी गाया था।1947 के विभाजन के बाद, जनवरी2006 में जब पंजाब के दोनों हिस्सों के बीच लाहोर-अमृतसर बस पहली बार चली तो सबसे पहली बस पर 26 यात्री थे, जिसमे से 15पाकिस्तान सरकार के अफ़सर थे। बाक़ी यात्रियों में से 7 रेशमा और उनके परिवारजन थे।
रेशमा सितारा-ए-इम्तियाज़ से सम्मानित पाकिस्तानी लोक गायिका थीं। वो भारत में भी काफ़ी लोकप्रिय थी। रेशमा प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक सुभाष घई की फ़िल्म हीरो के ‘लंबी जुदाई’ वाले गाने से भारत में बहुत मशहूर हुई थीं। राजस्थान के बीकानेर में रेशमा का जन्म हुआ था। रेशमा का भारत से भी गहरा रिश्ता रहा है। बंटवारे के बाद रेशमा का परिवार कराची चला गया था।12 साल की उम्र से ही रेशमा गायकी में मशहूर हो गईं। पाकिस्तान रेडियो पर रेशमा ने अपना पहला सूफ़ी गाना लाल मेरी... गाया। बाद में ये एक बड़ी सूफ़ी गायिका के रूप में जानी गईं।
1947 में राजस्थान के बीकानेर में एक बंजारा परिवार में जन्मी रेशमा लोक गायकी के लिए मशहूर रहीं। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार कराची जाकर बस गया। रेशमा ने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी और वह दरगाह पर गाती थीं। ऐसे ही, शहबाज कलंदर की दरगाह पर 12 साल की नन्हीं रेशमा को गाते सुन कर एक टीवी एवं रेडियो प्रोड्यूसर ने पाकिस्तान के सरकारी रेडियो पर चर्चित गीत ‘लाल मेरी’ रेशमा से गवाने की व्यवस्था की। यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ और रेशमा पाकिस्तान के लोकप्रिय लोक गायकों में शामिल हो गईं। 1960 के दशक में रेशमा का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था और उन्होंने पाकिस्तानी तथा भारतीय फ़िल्म उद्योग में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।पाकिस्तानी बैंड ‘लाल’ के प्रमुख गायक शहराम
अजहर ने बताया, वह अपने आप में एक संस्थान थीं और उनकी जैसी गायिका के जाने का मतलब एक युग का अवसान है। उनका जाना संगीत जगत की बहुत बड़ी क्षति है। हाय ओ रब्बा नहीं लगदा दिल मेरा और अंखियां नू रहने दे अंखियों दे कोल कोल जैसे गीत रेशमा की रेशमी आवाज़ में सज कर मानो खुद पर इठलाते थे। उनकी आवाज़ में अलग ही तरह की कशिश थी जो उनको सबसे अलग पहचान देती थी।
रेशमा का 3 नवम्बर 2013 को लाहौर , पाकिस्तान में निधन हो गया। रेशमा को गले का कैंसर था और वह लंबे समय से लाहौर के एक अस्पताल में भर्ती रहीं। रेशमा ने बाद में इसी अस्पताल में अंतिम सांस ली। अस्पताल सूत्रों के मुताबिक रेशमा क़रीब एक महीने से कोमा में
थीं। बॉलीवुड की फ़िल्म 'हीरो' में उनका गाना 'लंबी जुदाई...' काफ़ी मशहूर हुआ था। 'हीरो' फ़िल्म के निर्देशक सुभाष घई सहित तमाम हस्तियों ने रेशमा के निधन पर शोक जताया। सुभाष घई ने कहा, 'रेशमा जी आज भी हमारे दिल में हैं। मैं जब भी सूफी गानों के बारे में सोचता हूं तो रेशमा जी याद आ आती है।'
🏆राष्ट्र के प्रति उनकी सेवाओं के लिए 2008 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा सितारा-ए-इम्तियाज़ (उत्कृष्टता का सितारा) से सम्मानित ।
1982 में पाकिस्तान सरकार द्वारा प्राइड ऑफ परफॉरमेंस अवार्ड
2000 में पीटीवी अवार्ड में रेशमा को सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार मिला।
कराची , पाकिस्तान के एक पत्रकार मुर्तजा सोलंगी , जो रेडियो पाकिस्तान के लिए भी काम करते थे , ने
1970 के दशक में विभिन्न रेडियो स्टेशनों पर रेशमा के प्रदर्शन की व्यवस्था की थी, ने कहा, "मैं रेशमा को कैसे भूल सकता हूँ? मेरे युवा वर्षों में, उनकी आवाज़ ने हमेशा मुझे समृद्ध किया और उन्होंने राजस्थान , चोलिस्तान और सिंध को जोड़ा । वह रेगिस्तान का फूल थीं, प्यार, संगीत और शांति का प्रतीक"।
रेशमा को 12 साल की उम्र में लाल शाहबाज कलंदर की दरगाह पर गाते हुए पाकिस्तानी टेलीविजन और रेडियो निर्माता सलीम गिलानी ने देखा था। गिलानी ने 1968 में रेडियो पाकिस्तान पर "लाल मेरी पट रखियो" की रिकॉर्डिंग करने की व्यवस्था की। वह तुरंत हिट हो गईं और उस दिन से, रेशमा पाकिस्तान की सबसे लोकप्रिय लोक गायिकाओं में से एक रही हैं, और अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है। रेशमा 1968 से टेलीविजन पर दिखाई दे रही थीं, पाकिस्तानी और भारतीय फिल्म उद्योगों दोनों के लिए गाने रिकॉर्ड कर रही थीं, और देश और विदेश में लाइव कॉन्सर्ट में प्रदर्शन कर रही थीं।
उनके कुछ प्रसिद्ध गाने हैं "दमा दम मस्त कलंदर", "है ओ' रब्बा नहीं लगदा दिल मेरा", "सुन चरखे दी मीठी मीठी ख़ूक महिया मीनू याद औंदा", "वे मैं चोरी चोरी तेरय नाल लाइयां अखियां" (प्रसिद्ध पंजाबी कवि मंजूर हुसैन झल्ला के गीत ), " किथै नैन ना जोरी ", "लंबी जुदाई" और "अंखियां नू रेहेन दे अंख्यां दे कोल कोल"।
उपरोक्त गीत का इस्तेमाल राज कपूर ने अपनी फिल्म बॉबी में किया था , "अंखियों को रहने दे अंखियों के आस पास", जिसे लता मंगेशकर ने गाया था । पायरेटेड टेप की बदौलत उनकी प्रसिद्धि सीमा पार कर गई थी। वह बहुत बाद में भारत में लाइव प्रदर्शन करने में सक्षम हुई, 1980 के दशक के दौरान जब भारत और पाकिस्तान ने कलाकारों के आदान-प्रदान की अनुमति दी। सुभाष घई ने उनकी आवाज़ का इस्तेमाल फिल्म हीरो में किया , जिसमें उनका सबसे प्रसिद्ध गीत "लंबी जुदाई" था।
अपने करियर के दौरान उन्हें भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिलने के लिए आमंत्रित किया गया था ।
2004 में, उन्होंने "अशकां दी गली विच मुकाम दे गया" रिकॉर्ड किया, जिसका उपयोग बॉलीवुड फिल्म वो तेरा नाम था में किया गया था , और यह भारत में एक हिट रिकॉर्ड भी था।
जनवरी 2006 में, वह लाहौर-अमृतसर बस के उद्घाटन में यात्रियों में से एक थीं, जो 1947 के बाद से पंजाब के दोनों हिस्सों को जोड़ने वाली पहली ऐसी सेवा थी। बस में कुल 26 यात्री थे जिनमें से 15 पाकिस्तानी अधिकारी थे, और रेशमा ने अपने और अपने परिवार के लिए सात सीटें बुक की थीं। रेशमा ने इस दौरे पर भारत में कई प्रदर्शन देने की योजना बनाई थी।
उनका अंतिम निवास स्थान पाकिस्तान के लाहौर के इचरा क्षेत्र में था ।
उनकी छोटी बहन कनीज़ रेशमा भी एक पेशेवर गायिका हैं।
1980 के दशक में रेशमा को गले के कैंसर का पता चला था।बाद के वर्षों में, उनका स्वास्थ्य खराब हो गया, जिसके कारण राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ उनकी सहायता के लिए आगे आए, उन्हें बैंक ऋण चुकाने में मदद करने के लिए दस लाख रुपये दिए, साथ ही उन्हें 10,000 रुपये प्रति माह की सुरक्षित सहायता भी दी। उन्होंने उन्हें अपने लिए ज़मीन का एक टुकड़ा सुरक्षित करने में भी मदद की, लेकिन सरकार में बदलाव के कारण यह संभव नहीं हो सका।
उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि 6 अप्रैल 2013 को उन्हें लाहौर , पाकिस्तान के 'डॉक्टर्स हॉस्पिटल' में भर्ती कराया गया। पंजाब, पाकिस्तान की कार्यवाहक सरकार ने उनके सभी चिकित्सा व्ययों का भुगतान करने का फैसला किया। उन्हें बताएं कि उनका वजन कम हो गया है और वह तुरंत जवाब देती हैं, " तो क्या? मैं इस से स्लिम, स्मार्ट भी तो हो गई। " लेकिन फिर बताती हैं, "डॉक्टरों ने मुझे तेल-मसालेदार भोजन कम करने की सलाह दी है।" वह सहजता से स्वीकार करती थीं, "मुझे शास्त्रीय संगीत का कोई प्रशिक्षण नहीं है, मैं किसी राग का 'र' भी नहीं जानती। इसलिए जब मैं गाती हूँ और कोई तकनीकी पहलू छूट जाता है, तो कृपया मुझे माफ़ करें," यह विनम्र आत्मा श्रोताओं से यही कहती थी। "मेरे लिए, भारत और पाकिस्तान में कोई अंतर नहीं है, वे मेरी दो आँखों की तरह हैं।"
अक्टूबर 2013 में रेशमा कोमा में चली गईं और 3 नवंबर 2013 को लाहौर के एक अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।
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