अख्तर उल ईमान (जनम)

अख़्तरुल ईमान जन्म :12 Nov 1915निधन :09 Mar 1996
 परिचय
उपनाम :'अख़्तर'

मूल नाम :अख़्तर-उल-ईमान

जन्म :12 Nov 1915 | बिजनौर, उत्तर प्रदेश

निधन :09 Mar 1996
पुरस्कार :साहित्य अकादमी अवार्ड(1962)

अख़तरुल ईमान उर्दू नज़्म के नए मानक स्थापित करने वाले अद्वितीय शायर हैं जिनकी नज़्में उर्दू अदब के धरोहर का अमूल्य हिस्सा हैं। उन्होंने उर्दू शायरी की लोकप्रिय विधा ग़ज़ल से किनारा करते हुए सिर्फ़ नज़्म को अपने काव्य अभिव्यक्ति का ज़रिया बनाया और एक ऐसी ज़बान में गुफ़्तगु की जो शुरू में,उर्दू शायरी से दिलचस्पी रखने वाले तग़ज़्ज़ुल और तरन्नुम आश्ना कानों के लिए खुरदरी और ग़ैर शायराना थी लेकिन वक़्त के साथ यही ज़बान उनके बाद आने वालों के लिए नए विषयों और अभिव्यक्ति की नए आयाम तलाश करने का हवाला बनी। उनकी शायरी पाठक को न तो चौंकाती है और न फ़ौरी तौर पर अपनी गिरफ़्त में लेती है बल्कि आहिस्ता-आहिस्ता, ग़ैर महसूस तरीक़े पर अपना जादू जगाती है और स्थायी प्रभाव छोड़ जाती है। उनके चिंतन को भ्रम या कैफ़ आवर ग़िनाइयत के दायरे तक सीमित नहीं किया जा सकता था, इसीलिए उन्होंने अभिव्यक्ति का वो ढंग अपनाया जो ज़्यादा से ज़्यादा संवेदी, भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक अनुभवों का समावेश कर सके। यही वजह है कि मौज़ूआत,एहसासात और अनुभवों की जो विविधता अख़तरुल ईमान की शायरी में मिलती है वो उनके दूसरे समकालीन शायरों के यहाँ नहीं है। उनकी हर नज़्म भाषा, शब्दावली, लब-ओ-लहजा और सामंजस्य की एक नई प्रणाली का परिचय देती है। अख़तरुल ईमान के लिए शायरी एक ज़ेहनी तरंग या तफ़रीही मशग़ला नहीं था। अपने संग्रह “यादें” की भूमिका में उन्होंने लिखा, “शायरी मेरे नज़दीक क्या है? अगर मैं इस बात को एक लफ़्ज़ में स्पष्ट करना चाहूँ तो मज़हब का लफ़्ज़ इस्तेमाल करूँगा। कोई भी काम, जिसे इंसान ईमानदारी से करना चाहे, उसमें जब तक वो लगन और तक़द्दुस न हो जो सिर्फ़ मज़हब से वाबस्ता है, इस काम के लिए अच्छा होने में हमेशा शुबहा की गुंजाइश रहेगी।” शायरी अख़तरुल ईमान के लिए इबादत थी और उन्होंने शायरी की नमाज़ कभी जमाअत के साथ नहीं पढ़ी। जिन शायरों के यहां उनको इबादत समझ कर शायरी करने की विशेषता नहीं मिली, उनको वो शायर नहीं बल्कि महज़ बैत साज़ समझते थे। मजाज़, मख़दूम, फ़ैज़ और फ़िराक़ को वो किसी हद तक शायर मान लेते थे लेकिन बाक़ी दूसरों की शायरी उनको रचनात्मक कविता से बाहर की चीज़ नज़र आती थी।


अख़तरुल ईमान ने ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ झेला। वो 12 नवंबर 1915 को पश्चिमी उतर प्रदेश के ज़िला बिजनौर की एक छोटी सी बस्ती क़िला पत्थरगढ़ में एक निर्धन घराने में पैदा हुए। वालिद का नाम हाफ़िज़ फ़तह मुहम्मद था जो पेशे से इमाम थे और मस्जिद में बच्चों को पढ़ाया भी करते थे। उस घराने में दो वक़्त की रोटी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मसला थी। वालिद की रंगीन मिज़ाजी की वजह से माँ-बाप के ताल्लुक़ात कशीदा रहते थे और माँ अक्सर झगड़ा कर के अपने मायके चली जाती थीं और अख़तर शिक्षा के विचार से बाप के पास रहते। वालिद ने उनको क़ुरआन हिफ़्ज़ करने पर लगा दिया लेकिन जल्द ही उनकी चची जो ख़ाला भी थीं उनको दिल्ली ले गईं और अपने पास रखने के बजाय उनको एक अनाथालय मोईद-उल-इस्लाम (दरियागंज स्थित मौजूदा बच्चों का घर) में दाख़िल करा दिया। यहां अख़तरुल ईमान ने आठवीं जमात तक शिक्षा प्राप्त की। मोईद-उल-इस्लाम के एक उस्ताद अब्दुल वाहिद ने अख़तरुल ईमान को लिखने-लिखाने और भाषण देने की तरफ़ ध्यान दिलाया और उन्हें एहसास दिलाया कि उनमें अदीब-ओ-शायर बनने की बहुत संभावनाएं हैं। उनकी हौसला-अफ़ज़ाई से अख़तर ने सत्रह-अठारह साल की उम्र में शायरी शुरू कर दी। यह स्कूल सिर्फ़ आठवीं जमात तक था, यहां से आठवीं जमात पास करने के बाद उन्होंने फ़तेहपुरी स्कूल में दाख़िला ले लिया जहां उनके हालात और शिक्षा के शौक़ को देखते हुए उनकी फ़ीस माफ़ कर दी गई और वो चचा का मकान छोड़कर अलग रहने लगे और ट्युशन से अपनी गुज़र बसर करने लगे। 1937 ई. में उन्होंने उसी स्कूल से मैट्रिक पास किया।

मैट्रिक के बाद अख़तरुल ईमान ने ऐंगलो अरबिक कॉलेज (मौजूदा ज़ाकिर हुसैन कॉलेज)में दाख़िला लिया। कॉलेज में वो एक जुझारू वक्ता और अपनी सामान्य रूमानी नज़्मों की बदौलत लड़कियों के पसंदीदा शायर की हैसियत से जाने जाने लगे। उनके बेतकल्लुफ़ दोस्त उनको ब्लैक जापान अख़तरुल ईमान कहते थे। वो अशैक्षणिक गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और मुस्लिम स्टुडेंट्स फ़ेडरेशन के ज्वाइंट सेक्रेटरी थे। उनकी एक आवाज़ पर कॉलेज में हड़ताल हो जाती थी। उसी ज़माने में उनकी माँ ने, उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उनकी शादी एक अनपढ़ लड़की से कर दी जो तलाक़ पर ख़त्म हुई। ट्युशन में उनके पास लड़कियां भी पढ़ने आती थीं, उनमें एक शादीशुदा लड़की क़ैसर भी थी जिस पर अख़तर मोहित हो गए और अपने बुढ़ापे में उसकी याद में अपनी मशहूर नज़्म “डासना स्टेशन का मुसाफ़िर” लिखी। ये उनका आख़िरी इश्क़ नहीं था, वो बहुत जल्द किसी न किसी के इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाते थे और टूट कर मुहब्बत करने लगते थे। अपनी कमरुई और ग़रीबी के कारण उनमें आत्मविश्वास बिल्कुल नहीं था, वो लगभग हर क़रीब से नज़र आने वाली लड़की को पसंद कर लेते थे और फिर ख़ुद ही उससे मायूस हो जाते थे। वो जिससे मुहब्बत करते शिद्दत से मुहब्बत करते। ये मुहब्बतें उनके लिए कोई खेल तमाशा नहीं थीं, वो गहरी और शदीद होती थीं लेकिन दूसरी तरफ़ से बेतवज्जुही उनको महबूब बदलने पर मजबूर कर देती थी। फिर उन लड़कियों के अप्राप्य होने का एहसास उनको खा गया और स्थिति अलौकिक विचारों में बदल गई। उन्होंने ख़ुद को समझा लिया कि उनकी आदर्श प्रेमिका इस दुनिया में मौजूद ही नहीं है, अब वो एक काल्पनिक प्रेमिका की कल्पना में मगन हो गए जिसका वह एक नाम "ज़ुल्फ़िया” भी तजवीज़ कर लिया और अपना दूसरा काव्य संग्रह उसी के नाम समर्पित किया। ये ज़ुल्फ़िया इस दुनिया की जीव नहीं थी बल्कि एक कल्पना, एक आकृति और एक कैफ़ियत थी जिसके थोड़े बहुत मज़ाहिर जिसमें नज़र आए वो उसी की आराधना करने लगते। अपनी बाक़ी ज़िंदगी में, इंसानी, सामाजिक, नैतिक ग़रज़ कि ज़िंदगी के समस्त क्षेत्रों के मूल्यों से वो उसी ज़ुल्फ़िया के हवाले से से रूबरू होते रहे और वही उनकी शायरी की बौद्धिक, संवेदनात्मक और भावात्मक आधार बन गई। ऐंगलो अरबिक कॉलेज से बी.ए करने के बाद उनको वहां एम.ए में दाख़िला नहीं मिला क्योंकि उनको कॉलेज की डिसिप्लिन के लिए ख़तरा समझा जाने लगा था। कुछ दिनों बेकार रहने के बाद वो साग़र निज़ामी की ख़्वाहिश पर 1941 में “एशिया” के संपादन के लिए मेरठ चले गए जहां उनकी तनख़्वाह 40 रुपये माहवार थी। मेरठ में अख़तर का दिल नहीं लगा और वो चार-पाँच माह बाद दिल्ली वापस आकर सप्लाई विभाग में क्लर्क बन गए। लेकिन एक ही माह बाद 1942 में उनकी नियुक्ति दिल्ली रेडियो स्टेशन में हो गई। ये नौकरी रेडियो स्टेशन की आंतरिक राजनीति की भेंट चढ़ गई और उनको निकाल दिया गया जिसमें कथित रूप से नून मीम राशिद का हाथ था। इसके बाद अख़तरुल ईमान ने किसी तरह अलीगढ़ जा कर एम.ए उर्दू में दाख़िला लिया लेकिन ग़रीबी की वजह से सिर्फ़ पहला साल मुकम्मल कर सके और रोज़ी की तलाश में पूना जाकर शालीमार स्टूडियो में बतौर कहानीकार और संवाद लेखक की नौकरी कर ली। लगभग दो साल वहां गुज़ारने के बाद वो बंबई चले गए और फिल्मों में संवाद लिखने लगे। 1947 में उन्होंने सुल्ताना मंसूरी से शादी की, ये मुहब्बत की शादी नहीं थी लेकिन पूरी तरह कामयाब रही।

बंबई पहुंच कर अख़तरुल ईमान की आर्थिक स्थिति में बेहतरी आई जिसमें उनकी अनथक मेहनत का बड़ा दख़ल था और जिसका सबक़ उनको शायर मज़दूर एहसान दानिश ने दिया था और कहा था, “अख़तर साहिब, देखो शायरी-वायरी तो अपने हिसाबों सब चला लेते हैं, रोटी मज़दूरी से मिलती है। मज़दूरी की आदत डालो अज़ीज़म!” बंबई की फ़िल्म नगरी में आकर अख़तरुल ईमान को दुनिया को देखने और इंसान को हर अंदाज़ में समझने का मौक़ा मिला। यहां की धोकेबाज़ियां, मक्कारियाँ, झूट, कीना-कपट का उन्होंने अध्ययन किया। उनका कहना था की फ़िल्मी दुनिया से मुझे अंतर्दृष्टि मिली।

अख़तरुल ईमान अपनी शायरी के उत्कृष्ट टीकाकार और आलोचक ख़ुद थे। वो अपनी किताबों की भूमिका स्वयं लिखते थे और पाठक का मार्गदर्शन करते थे कि उनको किस तरह पढ़ा जाये। जैसे “यह शायरी मशीन में नहीं ढली, एक ऐसे इंसान के ज़ेहन की रचना है जो दिन-रात बदलती हुई सामाजिक, आर्थिक और नैतिक मूल्यों से दो-चार होता है। जहां इंसान ज़िंदगी और समाज के साथ बहुत से समझौते करने पर मजबूर है जिन्हें वो पसंद नहीं करता। समझौते इसलिए करता है कि उसके बिना ज़िंदा रहना मुम्किन नहीं और उनके ख़िलाफ़ आवाज़ इसलिए उठाता है कि उसके पास ज़मीर नाम की एक चीज़ है। और ये तन्हा अख़तरुल ईमान के ज़मीर की आवाज़ नहीं बल्कि उनके युग के हर संवेदनशील व्यक्ति के ज़मीर की आवाज़ है। उनकी शायरी उसी बा ज़मीर आदमी के भावनाओं का प्रतिबिम्ब है जिसमें आक्रामक प्रतिक्रिया की गुंजाइश नहीं क्योंकि ये जूनून की नहीं अनुभूति की आवाज़ है।

अख़तरुल ईमान एक सुलह जू इंसान थे लेकिन शब्द की पवित्रता पर कोई आँच आना उनको गवारा नहीं था। समकालीन शायरों के बारे में उनकी जो राय थी उसमें किसी ख़ुद-पसंदी का नहीं बल्कि शब्द की पवित्रता की पासदारी को दख़ल था। अपने लेखन के हवाले से वो बहुत सख़्त-गीर थे। एक बार वो किसी फ़िल्म के संवाद लिख रहे थे जिसके हीरो दिलीप कुमार थे। उन्होंने किसी संवाद में बदलाव के लिए अख़तरुल ईमान का लिखा हुआ संवाद काट कर अपने क़लम से कुछ लिखना चाहा। अख़तरुल ईमान ने उन्हें सख़्ती से रोक दिया कि वो उनकी तहरीर को न काटें, अपना एतराज़ ज़बानी बताएं अगर बदलना होगा तो वो ख़ुद अपने क़लम से बदलेंगे। इसी तरह का एक और क़िस्सा है जब अख़तरुल ईमान बाक़ायदगी से सुबह चहलक़दमी के लिए जाया करते थे। एक रोज़ वो चहलक़दमी कर रहे थे कि सामने से जावेद अख़तर कहीं अपनी रात गुज़ार कर वापस आ रहे थे। वो अख़तरुल ईमान को देखकर बोले, “अख़तर भाई आपका ये मिसरा, उठाओ हाथ कि दस्त-ए-दुआ बुलंद करें, ग़लत है (यानी जब हाथ उठाने की बात कह दी गई है तो दस्त-ए-दुआ बुलंद करने का क्या मतलब?) अख़तरुल ईमान का छोटा सा जवाब था, “तुम उर्दू ज़बान के मुहावरे से वाक़िफ़ नहीं।” जावेद गर्म हो गए कि मैं जाँनिसार अख़तर का बेटा और मजाज़ का भांजा उर्दू के मुहावरे से वाक़िफ़ नहीं! इस पर अख़तरुल ईमान ने कुछ ऐसा कहा जो बक़ौल रावी लिखने के क़ाबिल नहीं। ख़ैर, जावेद बात को पी गए और उनसे कहा कि घर चलिए, चाय पी कर जाइएगा। लेकिन अख़तरुल ईमान ने गुस्से से कहा, “जाओ भाई, मेरी सैर क्यों ख़राब करते हो?” यहां राक़िम-उल-हरूफ़ को वो वाक़िया याद आता है जो वारिस किरमानी ने घूमती नदी में लिखा है कि वो जिस ज़माने में अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में फ़ारसी के प्रोफ़ेसर थे, ग़ालिब के शे’र
विसाल-ओ-हिज्र जुदागाना लज़्ज़ते दारद
हज़ार बार बरूए सद-हज़ार बार बया

पर एतराज़ करते हुए एक छात्रा ने कहा था कि ये कैसे मुम्किन है कि कोई हज़ार बार जा कर सद-हज़ार बार वापस आए और इस पर वारिस किरमानी ने उसको मश्वरा दिया था कि वो अदब की बजाय रियाज़ी के कोर्स में दाख़िला ले ले। ग़ालिब के लाजवाब शे’र की जिस तरह उस लड़की ने मिट्टी पलीद की वो तो क़ाबिल-ए-माफ़ी थी कि वो तालिब-इल्म और नापुख़्ता अदबी शऊर की मालिक थी लेकिन किरमानी साहिब शे’र की वज़ाहत न कर पाने और लड़की को रियाज़ी के कोर्स में दाख़िला लेने का मश्वरा देने के लिए ज़रूर इस क़ाबिल थे कि उनकी क्लास ली जाये।

मुंबई में अपनी 50 साला फ़िल्मी सरगर्मी के दौरान में अख़तरुल ईमान ने 100 से ज़्यादा फिल्मों के संवाद लिखे जिनमें नग़मा, रफ़्तार, ज़िंदगी और तूफ़ान, मुग़ल-ए-आज़म, क़ानून, वक़्त, हमराज़, दाग़, आदमी, मुजरिम, मेरा साया, आदमी और इंसान, चांदी-सोना, धरम पुत्र, और अपराध जैसी कामयाब फिल्में शामिल थीं, वक़्त और धरम पुत्र के लिए उनको बेहतरीन संवाद लेखन का फ़िल्म फ़ेयर ऐवार्ड से नवाज़ा गया।

उनकी नज़्मों के दस संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें गर्दाब, सब रंग, तारीक सय्यारा, आबजू, यादें, बिंत लम्हात, नया आहंग, सर-ओ-सामाँ, ज़मीन ज़मीन और ज़मिस्ताँ सर्द-मोहरी का शामिल हैं। यादें के प्रकाशन पर उनको साहित्य अकादेमी ऐवार्ड मिला, बिंत लम्हात पर उ.प्र. उर्दू एकैडमी और मीर एकैडमी ने उनको इनाम दिया, नया आहंग के लिए महाराष्ट्र उर्दू एकैडमी ने उनको ऐवार्ड दिया और सर-ओ-सामाँ के लिए मध्य प्रदेश हुकूमत ने उन्हें इक़बाल समान से नवाज़ा। इसी किताब पर उनको दिल्ली उर्दू एकैडमी और ग़ालिब इंस्टीट्युट ने भी इनामात दिए। तीन बार उनको ज्ञानपीठ ऐवार्ड के लिए नामज़द किया गया।

9 मार्च 1996 को दिल की बीमारी से उनका निधन हो गया और इसी के साथ उर्दू नज़्म अपने एक महान सपूत से महरूम हो गई। अख़तरुल ईमान ने अपने अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में काव्य भाषाविज्ञान के समस्त उपस्थित तत्वों को आज़माने के बजाय उन्होंने स्पष्ट और वास्तविक भाषा उपयोग कर के दिखा दिया कि शे’र कहने का एक अंदाज़ ये भी है। उनकी शायरी पाठक से अपने पठन की ही नहीं अपनी सुनवाइयों की भी प्रशिक्षण का तक़ाज़ा करती है।
वह भारतीय सिनेमा के सबसे लोकप्रिय लेखक और गीतकार भी थे

 अख्तर उल ईमान हिंदी सिनेमा के एक प्रसिद्ध उर्दू कवि और पटकथा लेखक थे, जिनका आधुनिक उर्दू नज़्म पर बड़ा प्रभाव था।  उन्होंने 1963 में धर्मपुत्र और 1966 में वक्त के लिए सर्वश्रेष्ठ संवाद का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।  उन्हें भारत की राष्ट्रीय साहित्य अकादमी, साहित्य अकादमी द्वारा उनके कविता संग्रह, यादें (यादें) के लिए 1962 में उर्दू में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।  
 अख्तर उल ईमान का जन्म 12 नवंबर 1915 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के किला पत्थरगढ़, नजीबाबाद में हुआ था।  उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बिजनौर में प्राप्त की, जहाँ वे कवि और विद्वान खुर्शीद-उल-इस्लाम के संपर्क में आए, जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे और राल्फ रसेल के साथ उनका लंबा जुड़ाव था। उन्होंने दिल्ली के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।  इमान ने काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साधन के रूप में अधिक लोकप्रिय ग़ज़ल की तुलना में नज़्म को प्राथमिकता दी। अख्तर उल इमान की भाषा "असभ्य और अकाव्यात्मक" है। वह अपने संदेश को प्रभावी और यथार्थवादी बनाने के लिए "असभ्य" और सांसारिक काव्यात्मक अभिव्यक्तियों का उपयोग करते हैं। उन्होंने नए लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण विरासत छोड़ी है  आधुनिक उर्दू कविता में नए रुझानों और विषयों की खोज करने वाले कवियों की यह पीढ़ी दार्शनिक मानवतावाद पर जोर देते हुए आधुनिक और समकालीन उर्दू नज़्म को एक नई दिशा देती है। अख्तर उल ईमान ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत शालीमार स्टूडियो पुणे (डब्लू. जेड. अहमद के स्वामित्व में) से की थी।  1947 के आरम्भ में वे 150 रुपये मासिक वेतन पर एक कहानीकार बन गये। जून 1947 में विभाजन के दंगों के कारण स्टूडियो बंद हो गया और उन्हें बम्बई जाना पड़ा।  कृष्ण चंद्र, रामानंद सागर और भरत व्यास भी जून 1947 के बाद बॉम्बे चले गए। उन्होंने टर्नर रोड पर अपना घर बसाया।

अख्तर उल ईमान फिल्मिस्तान के कहानी विभाग में चले गए, साथ ही उन्होंने कमाल अमरोही, एम. सादिक, एस. एम. यूसुफ और कबीर के लिए पटकथाएँ भी लिखीं।  अहमद। उन्होंने नास्तिक और अनारकली लिखीं, लेकिन उन्हें कोई श्रेय नहीं दिया गया। 1958 में, उन्होंने बारह सौ रुपये मासिक वेतन पर बी.आर. फिल्म्स के कहानी विभाग में काम करना शुरू किया। यह कानून, मुगल-ए-आजम जैसी फिल्मों की रिलीज के बाद ही संभव हुआ।  (वे सह-लेखक थे) और वक़्त ने उनकी किस्मत को तेज़ी से और अनुकूल मोड़ दिया। संवाद और पटकथा लेखन के लिए उन्हें ढेरों प्रस्ताव मिलने लगे और उन्होंने अपनी सेवाओं के लिए अच्छी रकम वसूलना शुरू कर दिया। वे सुल्ताना से विवाहित थे और तीन बेटियों शेहला के पिता थे।  , अस्मा और रक्षंदा और एक बेटा रमीश, जिसका नाम उन्होंने प्यार से गुड्डू रखा। उन्होंने उनकी अच्छी शिक्षा सुनिश्चित की और पिता के रूप में, उनसे और उनके कल्याण से बहुत जुड़े रहे।  फिल्म निर्माण में कदम रखने के बाद कवि को बड़ी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। 1979 में, जेमल सिंह के साथ पार्टनर के रूप में, अख्तर उल ईमान ने एक फिल्म "लहू पुकारेगा" का निर्माण किया। उन्होंने इसकी पटकथा लिखी और इसका निर्देशन भी किया। संपादन कक्ष से, नकारात्मकताएँ हटा दी गईं।  जेमल सिंह ने इसे अपने हाथों से रिलीज़ किया। लेकिन 1970 के बाद भारतीय फ़िल्म उद्योग में आमूलचूल परिवर्तन हो चुके थे। नए चेहरे, नए फ़िल्म निर्माता, नई अवधारणाएँ और नई चुनौतियाँ आ चुकी थीं। फ़िल्म जगत में नए समीकरण दिखाई दे रहे थे  फिल्म निर्माण का काम उन लोगों के हाथों में चला गया जो सिर्फ़ जल्दी पैसा कमाना चाहते थे। उन्होंने मसाला स्क्रिप्ट लिखने के कई प्रस्ताव ठुकरा दिए, जिनमें सामाजिक उद्देश्य की कमी थी। बी.आर. चोपड़ा से अलग होने के बाद, यश चोपड़ा के साथ भी उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे। 1975 से 1988 तक  13 सालों में उन्हें सिर्फ़ पाँच काम मिले, जिसमें उनकी अपनी फ़िल्म लहू पुकारेगा भी शामिल है। फ़िल्मों में उनके पास लगभग कोई काम नहीं था।  इसके बाद 1986 में उनकी बायपास सर्जरी हुई। उनके दामाद और अभिनेता अमजद खान ही उनकी मदद के लिए आगे आए। उन्होंने सभी व्यवस्थाएं कीं और श्रीमती सुल्ताना (उनकी पत्नी) डॉ. अशोक हितोलकर (उनके पारिवारिक चिकित्सक) के टिकट बुक किए।  ) और अख्तर उल ईमान को अमेरिका के लिए रवाना किया और एसटी ल्यूक अस्पताल टेक्सास को अग्रिम राशि का भुगतान किया। वह वहां करीब एक महीने तक रहे और 26000 अमेरिकी डॉलर के लंबित बिलों के साथ भारत लौट आए। अपने दामाद को उन्होंने बताया कि सभी  बिलों का भुगतान हो चुका था। फिर कुछ करीबी दोस्तों ने बीसीसीआई, हमदर्द फाउंडेशन और मुंबई की अन्य धर्मार्थ संस्थाओं से एक बड़ी रकम जुटाई। 1992 में अमजद खान की मौत कवि के लिए एक बड़ा सदमा थी।
✍️डॉ. अशोक ने फिर से दर्दनाक फिस्टुला का ऑपरेशन किया, जिसके बाद उन्हें किडनी की समस्या हो गई, जिसके लिए नियमित डायलिसिस की आवश्यकता थी। उन्होंने अपना विशाल बांद्रा फ्लैट भी 30 लाख में बेच दिया और रवि दर्शन (ए 3) के ग्राउंड फ्लोर पर दो कमरों के छोटे से फ्लैट में शिफ्ट हो गए। शमास उर रहमान फारूकी के हस्तक्षेप और अशोक वाजपेयी की मदद से उन्हें दो साल के लिए ₹5000 का मासिक वजीफा मिला। अकेले डायलिसिस पर खर्च ₹6000 प्रति माह था। उनकी पत्नी उनका साथ देने के लिए चट्टान की तरह खड़ी रहीं। वे 1994 से नियमित डायलिसिस पर थे।

अख्तर-उल-इमान का निधन 09 मार्च 1996 को बॉम्बे (मुंबई) में हुआ।

📖 कृतियाँ: पुस्तकें -
इस आबाद खराबे में (उर्दू) उर्दू अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित। भारत के एक प्रसिद्ध उर्दू लेखक की आत्मकथा।

 📖 कविता-
 अख्तर उल ईमान ने आठ संग्रह प्रकाशित किए हैं:
 गिरदाब (1943), आबजू (1944-1945)
 तारिक सय्यारा (1946-47), यादेन (1961)
 बिन्त-ए-लम्हात (1969), नया अहंग (1977)
 सर-ओ-समान (1982)
 ज़मीन ज़मीन (1983-1990)

 📖 खेलें -
 ▪️सबरंग (1948) : एक छंदीय नाटक।
 दूसरों द्वारा अनुवाद एवं संकलन।
 ज़मिस्तान सर्द महरिका (उर्दू) - एक अविस्मरणीय उर्दू कवि का अंतिम काव्य संग्रह।  सुल्ताना ईमान और बेदार बख्त 
 ▪️सड़क की क्वेरी - अख्तर-उल-ईमान की चुनिंदा कविताएँ, बैदर बख्त की विस्तृत टिप्पणी के साथ
▪️भारतीय सिनेमा - हिंदी सिनेमा में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है, यह देखते हुए कि उन्होंने पटकथा लेखक (संवाद, कहानी और पटकथा) के रूप में कितनी ऐतिहासिक और हिट फ़िल्में दी हैं। उनकी पहली ऐतिहासिक फ़िल्म कानून थी, जो इस तथ्य के बावजूद एक बड़ी हिट बन गई कि इसमें कोई गीत या हास्य दृश्य नहीं था। यह उपलब्धि हिंदी सिनेमा में बेमिसाल है। अन्य महत्वपूर्ण फ़िल्में जिनमें उन्होंने पटकथा लेखक के रूप में योगदान दिया, वे थीं धर्मपुत्र (1961) जिसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला और गुमराह, वक़्त, पत्थर के सनम और दाग़।

🏆पुरस्कार: साहित्यिक पुरस्कार -
● 1962: साहित्य अकादमी पुरस्कार - उर्दू: यादें (कविता)
● इकबाल सम्मान और कई अन्य साहित्यिक पुरस्कार।

 🏆फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार -
 ● 1963 : सर्वश्रेष्ठ संवाद : धर्मपुत्र
 ● 1966 : सर्वश्रेष्ठ संवाद : वक्त

 🎥अख्तर उल ईमान की फिल्मोग्राफी
 1988 विजय - लेखक
 1983 चोर पुलिस - लेखक
 1980 लहू पुकारेगा - निर्देशक
 1978 दो मुसाफ़िर - लेखक
 1977 चंडी सोना - लेखिका
 1975 ज़मीर - लेखक
 1974 36 घंटे - लेखक
           रोटी - लेखक
           नया नशा - लेखक
           बड़ा कबूतर - लेखक
           दाग - लेखक
           धुँध - लेखक
           जोशीला - लेखिका
           कुंवारा बदन - लेखिका
 1972 दास्तान - लेखक
           जोरू का गुलाम - लेखक
 1969 आदमी और इंसान - लेखक
           चिराग - लेखक
           इत्तेफाक - लेखक
 1968 आदमी - लेखक
 1967 हमराज़ - लेखक
           पत्थर के सनम  - लेखक
 1966 गबन - लेखक
           मेरा साया - लेखक
           फूल और पत्थर - लेखक
 1965 भूत बंगला - लेखक
           वक़्त - लेखक
 1964 शबनम - लेखिका
           यादें - लेखक
 1963 आज और कल - लेखक
           अकेली मत जइयो - लेखक
           गुमराह - लेखक
 1962 नीली आँखें - लेखिका
 1961 धर्मपुत्र - लेखक
           फ़्लैट नं. 9 - लेखक
 1960 बारूद - लेखक
           कल्पना - लेखिका
           कानून - लेखक
 1951 बिखरे मोती - गीत
 1950 निर्दोश - लेखक
 1948 अभिनेत्री-लेखिका
           झरना - लेखिका

 🎬 अख्तर-उल-इमान ने निम्नलिखित तीन फिल्मों के लिए गीत लिखे:
 ● 1946 पृथ्वीराज संयुक्त 
 ● 1948 पराई आग 
 ● 1951 बिखरे मोती 

 🎧  अख्तर उल ईमान ने तीन फिल्मों पृथ्वीराज संयुक्त (1946), 
पराई आग (1948) 
बिखरे मोती (1951) के लिए गीत लिखे हैं।  गाने इस प्रकार हैं -
 ● क्या जाने मन क्या कहता है... पृथ्वीराज संयुक्ता (1946) गायिका नीना, संगीतकार एस. के. पाल
 ● सुदर सपना बन के... पृथ्वीराज संयुक्ता (1946) गायिका नीना, संगीतकार एस. के. पाल
 ● अंगिया मास्की जाये बलम... पृथ्वीराज संयुक्त (1946) गायक एन.ए., संगीतकार  
 एस के पाल
 ● कौन बनाये कौन संवारे... पृथ्वीराज संयुक्त (1946) गायिका नीना, संगीतकार एस. के. पाल
 ● कोई सपने में दर्स दिखा गयो... पृथ्वीराज संयुक्त (1946) गायक एन.ए., संगीतकार एस. के. पाल
● पिया मियां को चली कामिनी... पृथ्वीराज संयुक्त (1946) गायक एन.ए., संगीतकार एस.  पराई आग (1948) गायिका जोहराबाई अंबालेवाली, नसीम अख्तर, संगीतकार गुलाम मोहम्मद
 ● आंसू थी मेरी जिंदगी... बिखरे मोती (1951) गायिका अमीरबाई कर्नाटकी - संगीतकार गुलाम मोहम्मद 
● क्यू ये दिल दीवाना... बिखरे मोती (1951) गायक।  मोहम्मद रफी, अमीरबाई कर्नाटकी - संगीतकार गुलाम मोहम्मद
 ● हम उनको समझते हैं उम्मीदों का सहारा - बिखरे मोती  (1951) गायिका लता मंगेशकर - संगीतकार गुलाम मोहम्मद 
● मिल लो राजा सड़किया पे मिल लो... बिखरे मोती (1951) गायिका लता मंगेशकर - संगीतकार गुलाम मोहम्मद
 ● ये जीना भी कोई जीना है... बिखरे मोती (1951) गायिका अमीरबाई  कर्नाटकी - संगीतकार गुलाम मोहम्मद
 ● होंथो पे हंसी दिल में है खुशी... बिखरे मोती (1951) गायिका लता मंगेशकर - संगीतकार गुलाम मोहम्मद 
● दोनों है मजबूर प्यारे... बिखरे मोती (1951) गायिका हमीदा बानो - संगीतकार गुलाम मोहम्मद

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