जय किशन (जन्म)

जयकिशन- 🎂4 नवम्बर 1932, ⚰️जयकिशन- 12 सितम्बर 1971 
यकिशन
🎂जयकिशन- 4 नवम्बर 1932, गुजरात

⚰️जयकिशन- 12 सितम्बर 1971 
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शंकर और जयकिशन

पूरा नाम शंकर सिंह रघुवंशी और जयकिशन दयाभाई पांचाल
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प्रसिद्ध नाम शंकर जयकिशन


कर्म-क्षेत्र संगीतकार

मुख्य रचनाएँ मेरी आंखों में बस गया कोई रे, जिया बेकरार है छाई बहार है, मुझे किसी से प्यार हो गया, हवा में उडता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का, अब मेरा कौन सहारा, बरसात में हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम, बिछड गई मैं घायल हिरनी आदि
पुरस्कार-उपाधि नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफेयर पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी जयकिशन और शंकर की जोड़ी ने लगभग 170 से भी ज्यादा फ़िल्मों में संगीत दिया।
शंकर जयकिशन
हिन्दी फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी है। भारतीय फ़िल्मों में जब भी सुकून और ताजगी का अहसास देने वाले मधुर संगीत की चर्चा होती है। संगीतकार जयकिशन और उनके साथी शंकर की बरबस ही याद आ जाती है। वह पहली संगीतकार जोड़ी थी, जिसने लगभग दो दशक तक संगीत जगत पर बादशाह की हैसियत से राज किया और हिन्दी फ़िल्म संगीत को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता दिलाने का काम किया।

परिचय

स्वर साम्रागी लता मंगेशकर आज जिस मुकाम पर हैं। वहां तक उनके पहुंचने में इस जोड़ी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। लता मंगेशकर के कैरियर को बुलंदी पर पहुंचाने में दो फ़िल्मों, महल और बरसात की अहम भूमिका रही। दोनों ही फ़िल्में 1949 में प्रदर्शित हुई थीं। पहली फ़िल्म का संगीत मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने दिया था और दूसरी फ़िल्म के संगीतकार जयकिशन और शंकर थे। यही वह फ़िल्म थी, जिससे उनके साथ गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी तथा अभिनेत्री निम्मी ने भी अपने कैरियर का आग़ाज किया था। इस फ़िल्म में शंकर जयकिशन ने गीतों की एक से बढकर एक ऐसी सरस और कर्णप्रिय धुनें बनाई थीं कि यह फ़िल्म गीत और संगीत की दृष्टि से बालीवुड के इतिहास में "मील का पत्थर" मानी जाती है। मेरी आंखों में बस गया कोई रे, जिया बेकरार है छाई बहार है, मुझे किसी से प्यार हो गया, हवा में उडता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का, अब मेरा कौन सहारा, बरसात में हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम, बिछड गई मैं घायल हिरनी, बन बन ढूंढूं, ( जैसे गीतों की ताजगी आज भी कम नहीं हुई है। लता मंगेशकर बड़ी विनम्रता से अपने कैरियर में मौलिक प्रतिभा की धनी इस संगीतकार जोड़ी के योगदान को स्वीकार करती हैं। जब भी शंकर जयकिशन का उनके सामने ज़िक्र होता है। वह कहना नहीं भूलतीं। उन्होंने शास्त्रीय, कैबरे, नृत्य, प्रेम तथा दु:ख और खुशी के नगमों के लिए स्वर रचनाएं की। उनके संगीत ने कई फ़िल्मों को जिन्दगी दी। अन्यथा वे भुला दी जातीं।

शंकर

मुख्य लेख : शंकर (संगीतकार)
15 अक्टूबर 1922 को जन्मे शंकर के पिता रामसिंह रघुवंशी मूलत: मध्य प्रदेश के थे और काम के सिलसिले में हैदराबाद में बस गये थे। शंकर को शुरु से ही कुश्ती का शौक़ था और उनका कसरती बदन बचपन के इसी शौक़ का परिणाम था। घर के पास के एक शिव मंदिर में पूजा अर्चना के दौरान तबला वादक का वादन भी बचपन में बहुत आकर्षित करता था। तबला बजाने की लगन दिनों दिन बढ़ती गयी। महफ़िलों में तबला बजाते हुए उस्ताद नसीर खान की निगाह उन पर पड़ी और शंकर उनके चेले हो गये। माली हालात ऐसे थे कि ट्यूशन भी करनी पड़ी। कहते हैं कि हैदराबाद में ही एक बार किसी गली से गुजरते हुए तबला सुनकर शंकर एक तवायफ़ के कोठे पर पहुँच गये और तबलावादक को ग़लत बजाने पर टोक दिया। बात बढ़ी तो शंकर ने इस सफ़ाई से बजाकर अपनी क़ाबिलियत का परिचय दिया कि वाह-वाही हो गयी। शंकर अपनी कला को और निखारने के लिए एक नाट्य मंडली में शामिल हो गये, जिसके संचालक मास्टर सत्यनारायण थे और हेमावती ने बम्बई जा कर पृथ्वी थियेटर्स में नौकरी कर ली, तो शंकर भी 75 रुपये प्रतिमाह पर पृथ्वी थियेटर्स में तबलावादक बन गये। पृथ्वी थियेटर्स के नाटकों में कुछ छोटी-मोटी भूमिकाएँ मिलने लगीं और वहीं शंकर ने सितार बजाना भी सीख लिया।

जयकिशन

मुख्य लेख : जयकिशन
4 नवम्बर 1932 को जन्मे जयकिशन मूलत: गुजरात के वलसाड़ ज़िले के बासंदा गाँव के लकड़ी का सामान बनाने वाले परिवार से थे। परिवार ग़रीब था और जयकिशन के बड़े भाई बलवंत भजन मंडली में गा-बजाकर कुछ योगदान करते थे। प्रारम्भिक संगीत की शिक्षा बाड़ीलाल और प्रेमशंकर नायक से मिली। बासंदा की ही प्रताप सिल्वर जुबली गायनशाला में उस वक़्त के मंदिरों के त्यौहार-संगीत और गुजराती आदिवासियों के नृत्य संगीत के तत्त्व उन्हीं दिनों जयकिशन के मन में घर कर गये जिसके कई रंग बाद में उनके संगीत में भी समय समय पर झलके। भाई बलवंत की नशे की लत से मौत के बाद जयकिशन अपनी बहन रुक्मिणी के पास वलसाड़ आ गये और अपने बहनोई दलपत के साथ कारखाने में कुछ दिन काम किया, फिर दलपत के साढू के पास बम्बई में ग्रांट रोड के पास रहते हुए एक कपड़े के कारखाने में काम करने के साथ साथ ऑपेरा हाउस के स्थित विनायक राव तांबे की संगीतशाला में हारमोनियम का रियाज़ जारी रखा।

शंकर जयकिशन की मुलाक़ात

शंकर जयकिशन की मुलाक़ात भी अजीब ढंग से हुई। ऑपेरा हाउस थियेटर के पास की व्यायामशाला में कसरत के लिए शंकर जाया करते थे और वहीं दत्ताराम से उनकी मुलाक़ात हुई। दत्ताराम शंकर से तबले और ढोलक की बारीकियाँ सीखने लगे, और एक दिन उन्हें फ़िल्मों में संगीत का काम दिलाने के लिए दादर में गुजराती फ़िल्मकार चंद्रवदन भट्ट के पास ले गये। वहीं जयकिशन भी फ़िल्मों में काम की तलाश में आये हुए थे। इंतज़ार के क्षणों में ही बातों में शंकर को पता चला कि जयकिशन हारमोनियम बजाते थे। उस समय सौभाग्य से पृथ्वी थियेटर में हारमोनियम मास्टर की जगह ख़ाली थी। शंकर ने प्रस्ताव रखा तो जयकिशन झट से मान गये और इस तरह पृथ्वी थियेटर्स के परचम तले शंकर और जयकिशन साथ-साथ काम करने लगे। 'पठान' में दोनों ने साथ-साथ अभिनय भी किया। काम के साथ-साथ दोस्ती भी प्रगाढ़ होती गयी। शंकर साथ-साथ हुस्नलाल भगतराम के लिए भी तबला बजाने का काम करते थे और दोनों भाइयों से भी संगीत की कई बारीकियाँ उन्होंने सीखीं। पृथ्वी थियेटर्स में ही काम करते करते शंकर और जयकिशन राजकपूर के भी क़रीबी हो गए। हालाँकि राज कपूर की पहली फ़िल्म के संगीतकार थे पृथ्वी थियेटर्स के वरिष्ठ संगीतकार राम गाँगुली और शंकर जयकिशन उनके सहायक थे, लेकिन बरसात के लिए संगीत की रिकार्डिंग के शुरुआती दौर में जब राजकपूर को पता चला कि बरसात के लिए बनायी एक धुन राम गाँगुली उसी समय बन रही एक दूसरी फ़िल्म के लिए प्रयुक्त कर रहे हैं तो वे आपा खो बैठे। शंकर जयकिशन की प्रतिभा के तो वो कायल थे ही और जब उन्होंने शंकर के द्वारा उनकी लिखी कम्पोज़िशन 'अम्बुआ का पेड़ है, वही मुडेर है, मेरे बालमा, अब काहे की देर है' की बनायी धुन सुनी तो उन्होंने राम गाँगुली की जगह शंकर जयकिशन को ही बरसात का संगीत सौंप दिया। यही धुन बाद में 'जिया बेकरार है, छायी बहार है' के रूप में 'बरसात' में आयी। फ़िल्म बरसात में उनकी जोड़ी ने जिया बेकरार है और बरसात में हमसे मिले तुम सजन जैसा सुपरहिट संगीत दिया। फ़िल्म की कामयाबी के बाद शंकर जयकिशन बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे सफल हो गये। इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फ़िल्म बरसात से ही गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी। फ़िल्म बरसात की सफलता के बाद शंकर जयकिशन राजकपूर के चहेते संगीतकार बन गये। इसके बाद राजकपूर की फ़िल्मों के लिये शंकर जयकिशन ने बेमिसाल संगीत देकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कार्य

🎥जयकिशन और शंकर की जोडी ने लगभग 170 से भी ज्यादा फ़िल्मों में संगीत दिया। उनकी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्में हैं-

बादल (1951)

नगीना (1951)
पूनम (1952)
शिकस्त (1953)
सीमा (1955)
बसंत बहार (1956)
चोरी-चोरी (1956)
नई दिल्ली (1956)
राजहठ (1956)
कठपुतली (1957)
यहूदी (1958)
अनाडी (1959)
छोटी बहन (1959)
कन्हैया (1959)
लव मैरिज (1959)
दिल अपना और प्रीत पराई (1960)
जिस देश में गंगा बहती है (1960)
जब प्यार किसी से होता है (1961)
जंगली (1961)
ससुराल (1961)
असली नकली (1962)
प्रोफसर (1962)
दिल एक मंदिर (1963)
हमराही (1963)
राजकुमार (1964)
आम्रपाली (1966)
सूरज (1966)
तीसरी कसम (1966)
ब्रह्मचारी (1968)
कन्यादान (1968)
शिकार (1968)
मेरा नाम जोकर (1970)
अंदाज़(1971)
लाल पत्थर (1971)
संन्यासी (1973)

सम्मान और पुरस्कार

जयकिशन और शंकर को चोरी चोरी (1956), 
अनाडी (1959), 
दिल अपना और प्रीत पराई (1960), प्रोफेसर (1963),
 सूरज (1966), 
ब्रह्मचारी (1966),
 मेरा नाम जोकर (1970), 
पहचान (1971)
 बेईमान (1972) के लिए नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला। अंतिम तीन पुरस्कार तो उन्हें लगातार तीन वर्ष तक मिले।
+स्पेशल स्टोरी+
 संगीत की दुनिया के चमकते सितारों का ज़िक्र जब कभी होता है... तब शंकर-जय किशन का नाम बेहद अदब से लिया जाता है। इस जादूगर ने अपने संगीत के जादू से कई स्थापित साज़िशों को बदल कर रख दिया। उनके एक से बढ़कर एक धुनों ने म्यूजिक को नए रेस्टॉरेंट से हटा दिया। असल में, आज इस जोड़ी का किरदार इसलिए निभाया जा रहा है क्योंकि म्यूजिक के इन प्रशंसकों में से एक शंकर सिंह रघुवंशी (शंकर सिंह रघुवंशी) की आज डेथ एनिवर्सरी है। शंकर जी का निधन 26 अप्रैल 1987 को हुआ था। ऐसे में उनके दादा वाले उन्हें पूरी शिद्दत से श्रद्धा सुमन निकर कर रहे हैं।

शुरुआती दिनों में तबला बजाते थे

शंकर (शंकर सिंह रघुवंशी) ने अपने शुरुआती दिनों में तबला बजाया और कला को बाबा नासिर खान साहिब की शिक्षा के रूप में प्रदर्शित किया। कई वर्षों तक शंकर ने प्रसिद्ध संगीतकार ख्वाजा खुर्शीद बय्या के शिष्य के रूप में तालीम हासिल और आर्केस्ट्रा में अभिनय भी किया था। शंकर सिंह रघुवंशी का जन्म 15 अक्टूबर 1922 को पंजाब में हुआ था। बचपन के दिनों से ही शंकर संगीतकार बनना चाहते थे।
विवाद
फिल्मफेयर में एक हस्ताक्षरित लेख में जयकिशन ने अनजाने में "ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर" (संगम) गीत को अपनी रचना बता दिया। इससे दोनों के बीच काफी कड़वाहट पैदा हो गई, क्योंकि शंकर ने इसे उनके बीच हुए अलिखित समझौते का उल्लंघन माना। लगभग उसी समय, शंकर ने गायिका शारदा को मौका दिया और लता मंगेशकर की जगह उन्हें नई गायिका के रूप में बढ़ावा देना शुरू कर दिया। हालाँकि, जयकिशन अपनी रचनाओं के लिए लता मंगेशकर के साथ ही जुड़े रहे। इस अवधि में, शंकर और जयकिशन ने फिल्मों के लिए अलग-अलग अनुबंध लेना शुरू कर दिया, हालाँकि ऐसी हर फिल्म में उन्हें संगीतकार के रूप में साथ दिखाया जाता रहा। मोहम्मद रफ़ी ने हस्तक्षेप किया और उनके मतभेदों को सुलझाने में उनकी मदद की; हालाँकि, यह अनुमान लगाया जाता है कि उनके रिश्ते पहले जैसे नहीं थे और इसका असर उनकी रचनाओं की गुणवत्ता पर पड़ा, जिसमें गिरावट आने लगी थी (जो जयकिशन के जीवनकाल के अंतिम चरणों और उनके निधन के तुरंत बाद रिलीज़ हुई फिल्मों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है)।

दूसरी ओर, जयकिशन, हसरत और शंकर, सभी ने इस विषय पर पूछे जाने पर, इस बात से इनकार किया कि उनके बीच कभी कोई अनबन हुई थी। वास्तव में, हसरत के अनुसार, काम का बंटवारा आपसी सहमति से हुआ था ताकि काम के भारी बोझ से निपटा जा सके, ताकि शंकर और शैलेंद्र काम का एक हिस्सा देखें जबकि जयकिशन और हसरत दूसरे हिस्से को देखें, लेकिन यह बंटवारा कठोर नहीं था; इस चरण के दौरान भी उनके बीच बहुत कुछ लेना-देना था। अंत में (जयकिशन के असामयिक निधन से ठीक पहले), 
उनकी कई आखिरी फिल्मों जैसे जाने अनजाने (1971), अंदाज (1971), आँखों आँखों में, में शंकर और जयकिशन एक साथ काम करते देखे गए। पीछे मुड़कर देखें तो ऐसा लगता है कि शंकर और जयकिशन के बीच तथाकथित अनबन को मीडिया और निहित स्वार्थों ने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और बाद में जयकिशन के बाद के वर्षों में शंकर को नीचा दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल किया। 

चूंकि शंकर ने शारदा ( संगम युग के बाद) का समर्थन करना जारी रखा और यहां तक ​​कि उनकी फिल्म और गैर-फिल्मी एल्बमों के लिए घोस्ट-कंपोज्ड संगीत भी दिया, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि लता मंगेशकर उनसे नाराज हो गईं और उनके लिए गाना बंद कर दिया। जबकि इस दावे में कुछ सच्चाई हो सकती है, दूसरी बात यह है कि लता मंगेशकर ने संगम के बाद उनके साथ काम करना बंद कर दिया था क्योंकि राज कपूर और शंकर दोनों ने संगम से "बुड्ढा मिल गया" गाने के लिए उनसे नाराजगी जताई थी, क्योंकि वह गाने के बोलों से सहज महसूस नहीं कर रही थीं। बाद में उन्होंने संन्यासी, दुनियादारी और आत्माराम में गाने गाए। फिर भी, उन्होंने संगम के बाद और अंत तक जयकिशन के लिए गाना जारी रखा।

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