नवंबर ਨਵਮਬਰ

 

ਨਵਾਂਬਰ 
नवंबर
सतीश मुडार ब्लॉगर का जन्म ब्रिटिश पंजाब भारत में हुआ था। 15 नवंबर को ब्लॉगर अपना 🎂 जन्म दिन मनाया करता है।

मेरा  निवास स्थान हिमाचल के जिला कांगड़ा में है जो हिमाचल पंजाब के बॉर्डर पर है।
पत्नी भावना हिमाचली है जिस से दो बचे भी हैं लड़की कनेडा की नागरिक है । और बेटा दुबई में कार्यरत है।
सतीश मुड़ार (शर्मा) 
मुड़ार ब्राह्मणों में से एक है। जिनके पूर्वज शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के राज पंडित हुआ करते थे।
मुड़ार कोशल गोत्र में आते हैं। यह लोग पाकिस्तान गुजरात के राजा महाराजा रणजीत सिंह के सरकारी पंडित (राज पुरोहित) हुए थे। लेकिन इनका कोई भी इतिहास नेट पर अपलोड न होने के कारण भूख की तलाश कर ही इकट्ठा किया जा सकता था। व्यवसायिक निर्माण भी टेढ़ी _खेड ही साबित हो रहा था। जिसका मुख्य कारण हिंदुस्तान पाकिस्तान डिवीजन के बाद यह लोग भारत में आ कर वहां चले गए जहां तक ​​महाराजा ब्रम्हांड सिंह का राज्य फेल हुआ था। दूसरी मुश्किल राजनीतिक यह भी हो सकती है कि अध्यापन ब्राह्मणों को शर्मा में शामिल किया गया हो। मै भी मुछार भाईयों को सभी शर्मा के उपनाम में समा गए। ये रीति रिवाज तो ब्राह्मण आम हैं। इनमें से एक (कुल के देवी देवताओं की) जानकारी इन्ही के पास थी। नाग देवता इनके कुल देवता और सत्योति देवी जिनके कुछ मुखार बिदारो भी बताए गए हैं।
बिदारो बुक से स्पष्ट होता है कि वो उनकी कुल की बेटी थी। इसलिए उद्देश्य धी_ध्यान कह कर पूजा करने लगा परिवार का दान कन्याओं को देने की प्रथा बन गई (अभी संशोधन की बहुत आवश्यकता है)

जानकारी के अनुसार

मुड़ार एक ब्राह्मणों की जाती है जो गुजरांवाला पाकिस्तान के महाराजा रणजीत सिंह जी के राज्य में सरकारी पंडित थे।
आज इनका इतिहास ढूंढना दुर्लभ कार्य है। यह लोग अपने उपनाम मुड़ार का कम शर्मा ब्राह्मण का अधिक प्रयोग करते है।जो पूरे भारत में जहां – जहां तक राजा रणजीत सिंह का राज्य फेला था पाए जाते है। इनके कुल वृक्ष की एक नही कई पोथियां अलग – पंडो के पास हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों के पास हैं। जिससे से इनको एक स्थान पर नही ढूंढा जा सकता। ऐसी ही एक पोथी श्रवणनाथ घाट (वट वृक्ष के सामने) हरिद्वार में पं. छज्जू राम चेत राम पटुवार के पास देखी जा सकती है। अंग्रेजी में SHARWAN NATH GHAT HARIDWAR (U.K.)में
मुड़ारो के कुलदेवता नाग और कुलदेवी . सत्योती माता है जिनको बिद्रो बुआ जी जी भी कहते है। इन के कुछ रीति रिवाज भी है जिसका पालन करने का विधान है। काला कपड़ा पहनना इनके कुल में वर्जित है। दूध का वयोपार भी यह लोग नही कर सकते पर समय अनुसार कुछ लोग इस नियम का पालन ना करते भी देखे गए है। यह लोग नाग देवता को सफेद कपड़ा लपेट देते हैं। इनकी महिलाएं भी उनके सामने पूजा के समय घूंघट के बिना उपस्थित नही हो सकती।

पारिवारिक स्थिति

विप्र वंश_ कौशल गौत्र
जाती मुडार (शर्मा)
वासी अज्ञात पूरे विश्व में पाए जाते है
नाम अनुज मुड़ार (शर्मा)
पुत्र सतीश (शर्मा) मुड़ार
पुत्र बलदेव कुमार (शर्मा) मुड़ार

दादा अनुज मुड़ार बलदेव कुमार (शर्मा)मुड़ार
पुत्र पंडित अनंत राम मुड़ार
पुत्र पंडित बद्री नाथ मुड़ार
स्पूत्र पंडित गिरधारी लाल मुड़ार के
सपुत्र कहे जाते हैं ।

यह संक्षिप्त विवरण है।


ब्लॉगर


संपूर्ण गीता का सार
1. श्रीकृष्ण
गीता के सबसे प्रमुख पात्र और अर्जुन के मित्र, मार्गदर्शक और गुरु। श्रीकृष्ण गीता का सारा ज्ञान अर्जुन को देते हैं, इस लिए भी उनका चरित्र ज्ञान, करुणा, और दिव्यता का प्रतीक ओर उनकी महानता को ही दर्शाता है ।
मुख्य संदेश: श्रीकृष्ण का ज्ञान कर्म, भक्ति, ज्ञान, और योग का समावेशी संदेश है। उनका हर संवाद जीवन के किसी न किसी पहलू पर तो प्रकाश अवश्य ही डालता है।
जैसे श्रीकृष्ण
भूमिका:में श्रीकृष्ण गीता के सबसे प्रमुख पात्र और अर्जुन के मित्र, मार्गदर्शक और गुरु। श्रीकृष्ण गीता का सारा ज्ञान अर्जुन को देते हैं, इसलिए उनका चरित्र ज्ञान, करुणा, और दिव्यता का प्रतीक है।
मुख्य संदेश: श्रीकृष्ण का
ज्ञान कर्म,ज्ञान और कर्म एक-दूसरे के पूरक होते हैं. ज्ञान कर्म के महत्व को बताता है और कर्म करने का सही तरीका भी बताता है. ज्ञान के मार्गदर्शन में कर्म रूपी लक्ष्य को पाने में मदद भी तो करता है . ज्ञान और कर्म से जुड़ी कुछ और बातेंः

ज्ञान को जब कर्म में ढाला जाता है, तभी लक्ष्य की प्राप्ति होती है. 
 ज्ञान के बिना कर्म दिशाहीन हो सकता है और लक्ष्य से भटक भी जाता है. 
 कर्म के बिना ज्ञान एक सामान्य चर्चा के अलावा कुछ भी नहीं रह जाए गी . 
 ज्ञान आंखों की तरह मार्गदर्शन करता है और कर्म साधन की तरह लक्ष्य तक पहुंचाता भी है. 
 भगवद गीता के अनुसार, जो कर्म निष्काम भाव से ईश्वर के लिए किए जाते हैं, वे बंधन नहीं बनाते. 
 गीता में कहा गया है कि मनुष्य को सकारात्मक भावना से लगातार कर्मशील रहना चाहिए. 
 ज्ञान के बिना कर्म दिशाहीन हो जाएगा और लक्ष्य से भटक जाएगा और अर्थहीन हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार कर्म के बिना ज्ञान एक सामान्य चर्चा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाएगा।
ज्ञान जब तक कर्म का रुप धारण नहीं करता, अभिष्ट फल की प्राप्ति नहीं हो सकती।एक आप का ज्ञान है जो आंखें बन कर मार्ग दर्शाते हैं और कर्म साधन बन कर लक्ष्य तक पहुंचाता है आगे भगति को ज्ञान से ही देखे जो सब को तो है पर पर्दे से ढका हुआ है उस पर्दे का हटना ही भगवान की प्राप्ति का योग बनता है।
भक्ति,
परिवार में रहते हुए परिवार और बच्चों को पालना मां बाप की सेवा से उत्तम भगति कोई नहीं
अब इस भगति को ज्ञान से जोड़ कर देखते हैं।ज्ञान आप के भीतर ही है आप ही खुद के गुरु ओर चेले भी तो है फिर आप को किस गुरु की तलाश की भटकना लगी हुई है?    आप अपने बच्चों की उम्र के सभी बच्चों को अपने ही बच्चों के बराबर समझते हुए उनसे प्रेम भाव और वैसा ही कर्म भी करना बनता है,ओर मां बाप की उम्र के सभी बजुर्गों में भी अपने ही मां बाप नजर आना बिना उनकी जाती कर्म देखे और उनके साथ भी अपने मां बाप जैसा ही व्यवहार करना। बराबर के सभी लोगों से अपने बड़े छोटे भाई बहनों जैसा ही व्यवहार बिना जाती धर्म ओर उपाधि देखे करना होगा।
पर ध्यान रहे पांव उतने ही फैलाना जितनी तुम्हारी चादर हो इसी स्टेज के आने पर ज्ञान और भक्ति का आपस में जुड़ना होता है। जिसका का मतलब अपने आप स्पष्ट होता जा रहा है। भक्ति का मतलब है कि आप खुद को शून्य बना लें, ज्ञान का मतलब है आप उनसे उनकी शर्तों पर जीएं। वरना, कोई मिलन नहीं होगा। जब आप अपनी बुद्धि ज्ञान विवेक का इस्तेमाल करते हैं और अपनी चरम प्रकृति तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, तो उसे ही ज्ञान-योग कहते हैं।
श्रीकृष्ण के ज्ञान, कर्म, भक्ति और योग को ऐसे भी जाना जा सकता है।
कर्म और ज्ञान एक दूसरे के पूरक है, जो गीता का केंद्रीय संदेश है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि सही ज्ञान ही सही कर्म की ओर ले जाता है, और निष्काम कर्म (अर्थात बिना फल की इच्छा के) ही मुक्ति का मार्ग है।
श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जब हम केवल अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तो वह कर्म ही योग बन जाता है। यानी ज्ञान का सही प्रयोग कर्म के साथ होना चाहिए, जिससे हम जीवन के उद्देश्य की ओर बढ़ सकें।
जब हम दूसरों को, विशेषकर परिवार और समाज को, अपने कर्मों से प्रेरित कर सकते हैं। कर्म में निरंतरता और स्थिरता बनाए रखना ज्ञान को स्थायी बनाता है।
भक्ति का व्यापक दृष्टिकोण:         भक्ति का जो विस्तार यहां दिया गया है, वह श्रीकृष्ण के आदर्शों के साथ मेल भी खाता है। गीता में भक्ति का अर्थ केवल पूजा ,पाठ,यंत्र,मंत्र,तंत्र की साधना तो है ही नहीं, बल्कि सभी में भगवान को देखने और सबके प्रति एक समान भाव रखने से है।जिस में विनम्रता और समर्पण का भाव नजर भी आए:                             श्रीकृष्ण भक्ति में अहंकार का त्याग और सेवा का भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। जब हम भक्ति में खुद को शून्य बना लेते हैं, तो हमें सबमें ईश्वर का दर्शन होता है।
समर्पण और सेवा का संतुलन: श्रीकृष्ण जो अविनाशी हैं और गुरुओं के भी गुरु है अर्जुन रूपी अपने चेले के रथ का सारथी बन सिखाते हैं, कि भक्ति का वास्तविक अर्थ सेवा है। सेवा के हम सभी अधिकारी है ।चाहे वह परिवार हो, समाज हो, या ईश्वर, सच्ची भक्ति निष्काम भाव से सेवा करने में ही होती है। पाठ, पूजा, जप, तप,तंत्र,मंत्र के सभी अधिकारी भी नहीं होते।
योग के माध्यम से समरसता:
  श्रीकृष्ण योग को केवल शारीरिक क्रिया नहीं मानते, बल्कि मानसिक और आत्मिक अनुशासन का मार्ग बताते हैं। इसे और स्पष्ट करने के लिए:
योग का उद्देश्य: श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि योग हमें स्वयं के साथ जोड़ता है। यह ज्ञान, भक्ति और कर्म का सम्मिलन है, जो आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
स्थिरता और संतुलन का महत्व: योग का सार यह है कि हम विपरीत परिस्थितियों में भी स्थिरता और संतुलन बनाए रखें। कर्मयोग कहलाता है जो हमें सिखाता है कि हम चाहे कितने ही कार्य में लगे हों, लेकिन मानसिक शांति बनाए रखना ही योग का असली अर्थ है।

यहां व्यावहारिक दृष्टिकोण: यह है कि
“पांव उतने ही फैलाना है जितनी चादर हो,” यह भक्ति और ज्ञान का व्यावहारिक सन्देश है।  जो हमें भी तो श्रीकृष्ण ही सिखाते हैं कि संतोष और संतुलन ही हमें वास्तविक जीवन में सफलता और शांति दे सकते हैं।
अब अर्जुन
गीता में अर्जुन को 14 नामों से बुलाया गया है:
अर्जुन, फाल्गुन, जिष्णु, कीर्ति, श्वेतवाहन, वीभत्सु, विजय, कृष्ण.

अर्जुन के कुछ और नाम भी है:
पार्थ, किरीटिन्, भीभस्तु, सव्यसाची, धनंजय, गाण्डीवधन्वन्, गुडाकेश, परन्तप, बीभत्सु, गांडीवधारी.

अर्जुन के बारे में कुछ और बातें भी जान लेते हैं तभी आगे बढ़ते है:
अर्जुन के चार पुत्र थे, जिनके नाम थे- श्रुतकर्मा,इरावन, बभ्रुवाहन, और अभिमन्यु है.
अर्जुन योद्धा होने के साथ-साथ संगीत और नृत्य में भी कुशल थे.
महाभारत के मुताबिक, अर्जुन इंद्र देव के अंश थे.
अब: गीता में अर्जुन एक संघर्षरत योद्धा हैं जो धर्म और अपने कर्तव्यों के बीच फँस कर रह जाते हैं। श्रीकृष्ण उनके मन के द्वंद्व को समझाते हैं और मार्गदर्शन भी अपने ज्ञान से ही देते भी हैं।
मुख्य संदेश: अर्जुन का चरित्र हमें मानवीय कमजोरी, संदेह, और प्रश्न करने की प्रवृत्ति का प्रतीक देता है। अर्जुन के जरिए हमें यह समझ आता है कि ज्ञान प्राप्ति का सबसे पहला कदम प्रश्न करना ही होता है।फिर सुनना और अमल में लाना।ना की गुरु बन के बैठे रहना इस लिए अर्जुन खुद को चेले के रूप में भी ले आते है। और आसानी से इस बात को समझा जा सकता है,कि मनुष्य खुद ही अपना मित्र और अपना शत्रु भी हो जाता है। ज्ञान से जुड़ कर (मित्र) अज्ञान से जुड़ कर (शत्रु)
धृतराष्ट्र
भूमिका: कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय धृतराष्ट्र अंधे  होने के बावजूद कौरवों के पक्ष में राजा के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं। उनका पुत्र मोह और सत्ता का मोह उन्हें निष्पक्षता से दूर रखता है। जो अंधा (अज्ञानी) होने के कारण अपने राजधर्म का पालन सही ढंग से नहीं करते और तो दूसरी ओर उनकी पत्नी भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेती है।
गांधारी, गंधार की राजकुमारी थीं.
भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से कराया था.
विवाह से पहले गांधारी को नहीं पता था कि धृतराष्ट्र जन्मांध हैं.
जब गांधारी को यह बात पता चली, तो उन्होंने भी हमेशा के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली.
धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र और एक पुत्री थी.
दुर्योधन और दु:शासन उनके पहले दो पुत्र थे.
धृतराष्ट्र का एक अनैतिक पुत्र भी था, जिसका नाम यूयुत्सु था.
महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को सौ पुत्रों की मां होने का वरदान दिया था.
मुख्य संदेश: धृतराष्ट्र का चरित्र यह दिखाता है कि अज्ञानता और आसक्ति कैसे मनुष्य के निर्णयों को प्रभावित करती है और विनाश का कारण ही बनती है।
संजय
भूमिका: संजय धृतराष्ट्र के सारथी और उनके लिए युद्ध के घटनाक्रम का प्रत्यक्षदर्शी हैं जो महाभारत युद्ध में अर्जुन के सारथी श्री कृष्ण के बीच होने वाली वार्ता के साक्षी (गवाह भी है)। संजय दिव्य दृष्टि के माध्यम से धृतराष्ट्र को युद्ध की घटनाओं का सजीव वर्णन करते हैं।
मुख्य संदेश: संजय के माध्यम से यह समझ आता है कि सच्चे ज्ञान और निष्पक्षता के साथ किसी घटना को देखना और समझना कितनाआवश्यक होता है।
युधिष्ठिर
भूमिका: युधिष्ठिर धर्मराज के रूप में धर्म और सत्य के प्रतीक माने जाते हैं। महाभारत के युद्ध में उनके निर्णयों का आधार धर्म और सत्य होता है।अब यहां धर्म को अगर सत्य के साथ जोड़ कर देखे तो प्रमुख चारों धर्म सनातनी हिंदू ,सनातनी मुसलमान,सनातनी सिख, सनातनी ईसाई , ओर पांचवें वेद के अनुसरण करता फकीर लोग जिनकी निशानी फिक्र, फाका, ओर संतोष होता है। और यह चारो उपरोक्त सनातनी धर्मो एक समानता में पाए जाते है।धर्म किसी को धारण करना खुद में उतारना होता है।इसी को धर्म कहते है।
अब एक नजर चारों धर्मो की शिक्षा पर जिनको धारण करने के लिए कहा गया है और इन को धारण करना ही धर्म हो जाता है। जैसे सदा सत्य के साथ रहो,व्याभिचारी ना बने, चोरी ना करे, चुगली ना करें, दूसरे के धन पर कभी बुरी नजर ना रखें (दूसरे का सोना मेरे लिए मिट्टी समान है जाने)निहत्थे पर वार ,मासूम की हत्या, झूठ ओर  जूठा कभी धारण ना करे पवित्रता पर ध्यान दे और उसे धारण करे। ऐसे सभी सूत्र धर्म बन जाते है और इनको ही धारण अपनाना धर्म होता है। अर्थात हम जिसको धारण करते है वो धर्म कहलाता है।इसे ऐसे भी समझ सकते हैं     
धर्म का मतलब है, वह चीज़ जिसे धारण किया जा सके. धर्म से जुड़ी कुछ और बातेंः

धर्म, संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है जो धारण किया जाये.

धर्म, समाज में व्यक्ति जीवन प्रति जो धारणा बनाता है या धारणा करता है वही धर्म है.
धर्म,भी कर्म प्रधान है और कर्म के लिए ज्ञान जरूरी है इन गुणों के योग को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है.
धर्म, नैतिक मूल्यों का आचरण है.
धर्म, वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है.
धर्म, वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है धर्म, मनुष्य का उससे संबंध जिसे वह पवित्र, पवित्र, निरपेक्ष, आध्यात्मिक, दिव्य या विशिष्ट श्रद्धा के योग्य बनाता है।
धर्म, लोगों द्वारा अपने जीवन और मृत्यु के बाद अपने भाग्य के बारे में अंतिम चिंताओं से निपटने के तरीके के रूप में भी माना जाता है.
 मुख्य संदेश: युधिष्ठिर का चरित्र हमें सिखाता है कि सत्य और न्याय का पालन करना कठिन हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टिकोण से यह आवश्यक और मूल्यवान होता है।
भीष्म पितामह
भूमिका: कौरवों की ओर से युद्ध में भाग लेने वाले भीष्म पितामह नैतिकता और आदर्शों का प्रतीक हैं, फिर भी वे कौरवों का पक्ष लेते हैं। वो भी एक प्रतिज्ञा के कारण आज तो हम भी प्रतिज्ञा लेते ओर तोड़ते रहते है भीष्म तोड़ते नहीं इस लिए “भीष्म प्रतिज्ञा” नाम पढ़ जाता है ।
मुख्य संदेश: भीष्म का जीवन कर्तव्य और नैतिकता के बीच संघर्ष को दर्शाता है। वे धर्म और अधर्म के बीच फँसते हैं, जिससे समझ आता है कि सही कर्तव्य का चुनाव आसान नहीं होता।क्यों कि उनकी प्रतिज्ञा ही सामने आ खड़ी होती है।
दुर्योधन
भूमिका: दुर्योधन कौरवों का नेतृत्व करते हैं और अपनी महत्वाकांक्षाओं और क्रोध के कारण युद्ध का मुख्य कारण बनते हैं।(क्रोध से अहंकार बलवान होता जाता है और इन दोनों के बढ़ने से राग द्वेष जैसे विकार भी उत्पन होने शुरू हो जाते हैं)
मुख्य संदेश: दुर्योधन का चरित्र हमें दिखाता है कि ज्ञान भी अज्ञानता में बदल जाता है क्योंकि दुरियोधन को ज्ञान देने वाले भी बड़े विद्वान ही थे पर अज्ञानता, क्रोध और अहंकार किस प्रकार विनाशकारी हो सकते हैं और आत्मनिरीक्षण का अभाव कैसे असफलता की ओर ले जा सकते है इसका वर्णन हम प्रत्यक्ष ज्ञान में भी देखते है।(अहंकार , क्रोध से उत्पन झगड़ा विद्वान वकील के पास पहुंच जाता है वकील साहब का दो रुपए से खरीदा गया पेन अगले के बैंक को आसानी से अपना बना लेता है अपने ज्ञान के कारण)
द्रोणाचार्य
भूमिका: कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य युद्ध में कौरवों के पक्ष में लड़ते हैं। उनकी स्थिति नैतिकता और कर्तव्य के बीच का संघर्ष है।
एक बुरा कर्म स्वर्ग में बैठे पूर्वजों को भी नर्क में धकेलने के लिए काफी हो जाता है। द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में पांचाल राज्य पर आक्रमण करके द्रुपद को बंदी बनाकर उनके सामने की मांग की। अर्जुन के नेतृत्व में पांडव और कौरवों ने पांचाल पर आक्रमण किया और द्रुपद की सेना को हराकर उन्हें बंदी बना लिया। फिर वे द्रुपद को द्रोणाचार्य के समक्ष लेकर आए। द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला ले लिया।दूसरे के कंधे पर बंदूक चलाना इसी को कहते है।जो उनकी बहुत बड़ी गलती रही
मुख्य संदेश: द्रोणाचार्य का चरित्र दिखाता है कि गुरु का कर्तव्य और निजी संबंधों के प्रति वफादारी में संतुलन बनाना कितना कठिन होता है।महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण गुरु को ही चेले अर्जुन के हाथों मरवा देते है।भगवान भी गुरु के नहीं अपने चेले के ही सहायक बनते है। आज के युग में प्रश्न करने वाले चेले कम पर गुरु कुछ ज्यादा ही नजर आते हैं।
कर्ण
भूमिका: कर्ण जन्म से सूर्यपुत्र और अर्जुन के प्रतिद्वंदी हैं। वे अधर्म के पक्ष में होते हुए भी अपने मित्र दुर्योधन के प्रति वफादार रहते हैं।
कर्ण गंगाजी में बहता हुआ जा रहा था कि महाराज धृष्टराज के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने उसे देखा और उसे गोद ले लिया और उसका लालन पालन करने लगे। उन्होंने उसे वासुसेन नाम दिया। अपनी पालनकर्ता माता के नाम पर कर्ण को राधेय के नाम से भी जाना जाता है।
(केसो भी यत्न करो काजल की कोठडी में काजल का दाग लागे ही लागे) कहते है एक बार ऋषि दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया था.

इस मंत्र के जाप से कुंती जिस भी देवता का आवाहन करतीं, उन्हें उसी देवता का पुत्र मिलता था.

कुंती ने इस वरदान का इस्तेमाल करके पांडवों को जन्म दिया था.

कुंती ने विवाह से पहले सूर्य देव से शिशु की मांग की थी, जिससे कर्ण का जन्म हुआ था. आज समाज में मंत्र पाने की होड लगी हुई है।इस को जानते हुए कि एक मंत्र के कारण कुंती कुआरी मां बन गई थीं तो हम ऐसा ना करे पर आप का तो ❤️ दिल है जो बिना मंत्र मानता ही नहीं। अपने मित्र बने शत्रु नहीं चलो आगे बढ़ते है।

कुंती ने धर्मराज, वायु, और इंद्र देवता का भी आवाहन किया था.

कुंती को यह वरदान बचपन में मिला था, जब राजा कुंतीभोज ने उन्हें गोद लिया था. राजा कुंतीभोज अपनी बेटी का एक राजकुमारी की तरह पालन-पोषण करते थे. एक बार ऋषि दुर्वासा, राजा कुंतीभोज के घर मेहमान बने थे. कुंती ने उनकी सेवा की और वे बहुत प्रसन्न हुए थे और मंत्र पकड़ा कर चलते बने इस लिए कहता हूं पहले हिंदू को हिंदू बनाओ.
मुख्य संदेश: कर्ण का चरित्र हमें दिखाता है कि व्यक्तिगत निष्ठा और जीवन की जटिलताएँ किस प्रकार किसी के निर्णय को प्रभावित कर सकती हैं।
आगे अन्य पात्रों की भूमिका पर भी विचार हो सकता है द्रोपदी का तो पहले ही समझ में आ ही गया होगा।
इन प्रमुख पात्रों के अलावा,  शकुनि, विदुर, अश्वत्थामा और कृष्ण के विभिन्न अवतार भी इस कथा का हिस्सा हैं। गीता के सन्देश को सम्पूर्ण रूप में समझने के लिए इन सभी पात्रों का अध्ययन करने से गीता के विभिन्न दृष्टिकोणों और जीवन-शिक्षाओं का गहन ज्ञान प्राप्त होता है।

यह सचमुच गीता जी का ही अनोखा प्रभाव है कि इसके हर पात्र और संवाद में जीवन के गूढ़ सत्य संक्षेप में समाहित हैं। गीता के पात्रों का गहन अध्ययन करते हुए ही, इसके केंद्रीय संदेश स्वतः स्पष्ट हो जाते हैं—क्योंकि ये सभी पात्र जीवन के विभिन्न पहलुओं को, मानव की कमजोरियों, कर्तव्यों, और नैतिक संघर्षों को उजागर करते हैं।

संयोगवश, यही गीता का सार भी है: हर पात्र और हर घटना में कुछ ऐसा छिपा है जो हमें अपने जीवन को समझने और उसे सुधारने का मार्ग दिखाता है। जैसे अर्जुन का संदेह, श्रीकृष्ण की करुणा, भीष्म का आदर्श, और कर्ण की निष्ठा—ये सब हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने का साहस और ज्ञान देते हैं।

*गंधारी का आंखों पर पट्टी बांधना*

प्राचीन भारतीय समाज में नारी को बहुत उच्च स्थान दिया गया था, और संस्कृत साहित्य, पुराणों, और महाकाव्यों में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। नारी को केवल गृहस्थी तक सीमित न मानकर, उसे आध्यात्मिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से पूजनीय समझा गया। आपने सही कहा, नामों में पति के पहले पत्नी का नाम लिया जाता था, जैसे राधा-कृष्ण, सीता-राम, पार्वती-शिव। इसका यह भी संकेत है कि नारी को प्राथमिकता और आदर दिया गया और उसे केवल परिवार का आधार नहीं, बल्कि उस समाज और संस्कृति का मुख्य स्तंभ माना गया।

नारी का यह स्थान एक गहरे आध्यात्मिक महत्व का द्योतक भी है। भारतीय परंपरा में यह मान्यता थी कि स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर संपूर्णता का निर्माण करते हैं। श्रीकृष्ण की भक्ति में राधा का स्थान सर्वोच्च है और राम के जीवन में सीता के बिना अधूरापन दिखाया गया है। इससे स्पष्ट है कि समाज में नारी को आध्यात्मिक, मानसिक, और सांस्कृतिक रूप से बराबरी का स्थान दिया गया।

गांधारी के प्रसंग में भी इसे अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। गांधारी ने अपनी स्वतंत्रता से यह संकल्प लिया कि वह अपने पति के दुखों को साझा करेंगी। यह उस समय की नारी की दृढ़ता और अपने सिद्धांतों के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है। गांधारी का यह निर्णय उनके लिए गर्व और त्याग का प्रतीक बनता है, और यह उनकी महानता का प्रतीक भी है।

साथ ही, यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि इतिहास के साथ समाज भी बदलता है। समय के साथ, नारी के स्थान में परिवर्तन आए, और कुछ परंपराओं में शायद उस आदर्श की हानि भी हुई होगी। परंतु मूल रूप से, भारतीय संस्कृति में नारी को देवियों के रूप में देखा गया, उन्हें अर्धांगिनी ही नहीं, बल्कि सम्पूर्णता के लिए आवश्यक समझा गया।

❤️✍️गीता के श्लोकों का अर्थ और संदेश मुख्यतः इसी आधार पर ही निर्णय निकलता है, लेकिन श्लोकों की गहराई में जाकर हमें और भी सूक्ष्म और गूढ़ विचार मिल सकते हैं। श्लोक गीता के उस संवाद का आधार बनाते हैं, जो कि स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए सटीक ज्ञान, नैतिकता और जीवन के मार्गदर्शन से भरपूर होते हैं। यह श्लोक इस ज्ञान को सूत्र रूप में प्रस्तुत करते हैं और हर श्लोक में एक विशेष संदर्भ में धर्म, कर्म, भक्ति, योग और ज्ञान को विस्तृत रूप से समझाया गया है।

1. कर्म और ज्ञान का संबंध - गीता के कई श्लोक कर्म और ज्ञान के अनिवार्य संबंध की चर्चा करते हैं, जैसे कि निष्काम कर्म योग। यह कर्म को ज्ञान के साथ मिलाकर उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं। गीता के अध्याय 2 के श्लोक 47 में श्रीकृष्ण कहते हैं, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" - इसका संदेश यही है कि कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। यह विचार अर्जुन के संशय को समाप्त कर उन्हें कर्म का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करता है।


2. भक्ति का स्वरूप - गीता के भक्ति योग के श्लोक, जैसे कि अध्याय 9 के श्लोक 22, श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि कोई पूर्ण समर्पण से भक्ति करता है तो वह उसकी रक्षा करते हैं। "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते", अर्थात जो मुझे एकमात्र साधन मानकर ध्यान करते हैं, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति भी वे स्वयं करते हैं। इस प्रकार भक्ति को एक गहरी आत्मा का समर्पण और प्रेम का माध्यम बताया गया है।


3. योग का महत्व - योग के श्लोक, जैसे कि अध्याय 6 में "उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्" का संदेश है कि व्यक्ति का आत्म-उत्थान स्वयं से ही होता है। यहां श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्म-संयम और आत्म-नियंत्रण के द्वारा व्यक्ति योग के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर सकता है।


4. संतुलन और धैर्य - गीता में विभिन्न श्लोकों में संतुलन का महत्व बताया गया है। जैसे अध्याय 6, श्लोक 16-17 में योग साधना के लिए उपयुक्त संतुलित जीवनशैली पर बल दिया गया है। यह श्लोक बताते हैं कि जीवन में अति का त्याग और संतुलन का महत्व किसी भी साधना में स्थिरता के लिए आवश्यक है।


5. धर्म के प्रति कर्तव्य - श्रीकृष्ण धर्म के विषय में गहन दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। जैसे अध्याय 3 में वे अर्जुन को कर्मयोग अपनाने और धर्म का पालन करने की सलाह देते हैं, जिससे समाज का कल्याण हो और व्यक्ति का भी आत्मोन्नति हो। यह श्लोक हमें बताते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का धर्म उसके कर्मों से जुड़े हुए हैं और इनका पालन ही मुक्ति की राह है।

इस प्रकार गीता के श्लोकों में भले ही वही विषय होते हैं, जिनकी चर्चा हमने मुख्य पात्रों की भूमिका और संदेश के दौरान की, लेकिन हर श्लोक उस मूल विचार को एक नई दिशा, गहराई और सार्थकता प्रदान करता है। श्लोकों में ज्ञान, कर्म, भक्ति, और योग की व्याख्या मुख्य पात्रों के माध्यम से प्रसारित होती है, लेकिन साथ ही यह श्लोक व्यक्ति के आंतरिक और आध्यात्मिक विकास में एक अद्भुत दिशा भी देते हैं।

गहराई में जाकर, प्रत्येक श्लोक एक नया दृष्टिकोण और नया अर्थ प्रस्तुत करता है, जो जीवन के अलग-अलग आयामों पर प्रकाश डालता है।

महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में जिन प्रमुख ब्राह्मण पुरोहितों का उल्लेख मिलता है 

उनमें

पंडित ज्वाला साहिब, 
पंडित बृजलाल, 
पंडित हरि दास,
 पंडित गोबिंद दास 
और पंडित रामजी दास
इनके समुदाय और उपजाति की विशिष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह पुष्टि करना कठिन है कि इनमें से कोई मुडार ब्राह्मण थे या नहीं।

इतिहास में कई बार ब्राह्मण पुरोहितों का वर्णन केवल उनके नाम या धार्मिक पद के आधार पर किया गया है, जबकि उनके विशिष्ट उपसमुदाय, जैसे मुडार ब्राह्मण, सरयूपारीण, कान्यकुब्ज, आदि के बारे में विवरण सामान्यतः दर्ज नहीं होते।

यदि मुडार ब्राह्मणों के ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध हों, तो संभवतः इनकी पुष्टि क्षेत्रीय दस्तावेज़ों या स्थानीय पारंपरिक ग्रंथों में मिल सकती है, क्योंकि इन उपसमुदायों की परंपराएं और कुल-देवताओं की जानकारी स्थानीय इतिहास में संग्रहीत रहती है।

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